Tuesday, 20 September 2011

दहेज़ दानव...

उसके हाथों की मेहंदी का रंग अभी सूखा भी ना था.
घर के बाहर बची कुछ झिलमिल-पतंगें बता रही थी,
अभी कुछ दिनों पहले ही आई थी वो यहाँ.
नयी दुनिया, नयी उमंगें, नए सपने और कुछ नए रिश्ते.
सब कुछ नया,
बस एक दानव पुराना...

ये दानव आसानी से शांत होता ही नहीं
ये मांगता है किसी की बलि या फिर पैसों की चमचमाती फली.
मारने की कोशिश भी की थी कुछ लोगों ने,
जाने क्यूँ कमबख्त जड़ से मरता ही नहीं...

किचेन में गयी थी वो शाम की चाय बनाने,
पता नहीं खिड़कियाँ तो सभी बंद थी,
ना जाने कहाँ से आ गया ये दानव
ले गया उसे अपने संग...

अखबार टटोला तो कोने में कहीं दिख गया बाइ चान्स
ऐसे कोने मैं कम ही टटोलता हूँ.
रपट लिखा दी गयी है और तलाश जारी है...

कुछ मानव शायद मिल भी जाएँ,
पर इस दानव का कुछ पता नहीं.
छिप के बैठा है कुछ दिमागों में हर गली-शहर में कहीं ना कहीं... 


Sunday, 18 September 2011

हिंदी सम्मेलन...

कल एक हिंदी सम्मेलन में गया था सपने में, 
प्रेमचंद जी भी दिखे थे, आँखों में आंसू थे उनके.
आन्सुवों का कारण था India जो कभी भारत था...

India तो खबरों में shine कर रहा है,
पर शायद भारत इस चमक में कहीं खो गया है...
और हिंदी भी कुछ धुंधली सी दिखती है,  
MNCs की भीड़ में...
   
कलम के सिपाही प्रेम जी देश के भी सिपाही थे,
उनकी किताबों में गाँव आज भी जिन्दा हैं.
जो आज केवल नक्शों में जिन्दा हैं...
असली कहानी तो सूखे-बंजर खेत और वीरान पड़े घर बताते हैं...

India की तो अब अपनी अलग ही भाषा है.
संस्कृति को जिसमे culture बुलाते हैं.
लोग कितने ही गरम हों कूल कहलाते हैं.
और हिंदी की तो बस रस्म निभाते हैं...

अब MNCs की भीड़ में भला मैं शिकायत करूँ भी क्यूँ .
और अगर करूँ तो किससे ?
मैं भी तो इसी भीड़ का हिस्सा हूँ.
बस रस्म निभाने के लिए सपने देखता हूँ...   
  

Friday, 16 September 2011

ये बारिश कुछ पूछती रहती है...

ये बारिश कुछ पूछती रहती है मुझसे हर बार
मैं हमेशा ही अनदेखा कर देता हूँ
आज बस में बैठने को जगह मिली
खिड़की के पास ही बैठा था
रेड लाइट पर बस रुकी,
तो फ़ुरसत से मैंने देखा बारिश को खिड़की के उस पार
फिर से कुछ पूछ रही थी...

क्या मियाँ आते नहीं अब भीगने को ?
मैं तो आज भी आसमान से बरस रही हूँ
आज भी बादलों का सन्देशा लाती हूँ
लेकिन तुम्हे तो फ़ुरसत ही नहीं
ऐसी भी क्या नाराजगी, जो ये शीशे की दीवार चढ़ा दी...

मेरे कुछ बोलने से पहले ही बत्ती हरी हो गयी
ट्रैफिक का शोर कुछ ज्यादा ही भारी था
बाय-बाय कहने का मौका तक नहीं मिला... 


Tuesday, 13 September 2011

कोहरे के परदे के पीछे...

कोहरे से ढकी पहाड़ियों के उस पार, कुछ परियां रहती हैं जहाँ...
सोचता हूँ, कल सुबह सूरज संग दौड़ लगाऊं और पहाड़ी के उस पार जाऊं
सुना है सूरज भी कुछ देर से पहुँचता है वहां
शायद शर्माता है परियों की खूबसूरती से
या फिर प्यार करता है इन परियों से...

सूरज के आने की खबर सुनकर,
ये परियां भी उड़ जाती हैं दूर देश कहीं
देश जो कुछ देर ही सूरज की पहुँच से दूर रहते हैं कहीं...

सूरज बड़ा ख्याल रखता है इन नाजुक परियों का
जान-बूझ कर छिपता है कोहरे के परदे के पीछे
इसे भी वो हँसती-खेलती परियां कुछ ज्यादा ही अच्छी लगती हैं
वरना भला सूरज के आगे किसी की चली है ?
इन परियों का पीछा करते-करते थकता भी है, पर फिर भी रुकता नहीं
वो परियों का हँसना-खेलना काफी होता है इसकी थकान मिटाने को...

बिना कोहरे वाले दिनों में परियां दिखती कहाँ हैं यूँ आसानी से,
सूरज बेचारा फिर थक जाता है
थक कर गुस्साता है, और हम सोचते हैं ये कमबख्त इतनी गर्मी क्यूँ ढाता है

माना कि सूरज को प्यार जताना नहीं आता
पर हाँ प्यार निभाना बेशक आता है...

हमे तो ये सूरज बस आग का एक गोला नजर आता है
जरा गौर से देखो तो दिखेगा,
इस कोहरे के परदे के पीछे ये भी अपना प्यार छिपाता है...


Saturday, 10 September 2011

सपनों का स्कूल...

कुछ इस तरह व्यस्त हूँ, कि फुरसत मिलती नहीं सपनों के स्कूल जाने की
सपनों के स्कूल की कोई उमर तो होती नहीं,
हाँ बस वो फीस शायद मैं जुटा पाता नहीं
'सही समय और चैन की नींद '...

पहले तो रोज ही चला जाता था मैं सपनों के स्कूल
अपनी मरजी के सब्जक्ट्स और टीचर्स
जब मरजी तब क्लास बंक, जब मरजी तब छुट्टी
और एग्जाम का भी टेन्शन नहीं...

अगली बार फुरसत से मिलूँगा जरूर प्रिंसिपल से, 
थोडा बहुत समझदार तो अब मैं भी हूँ
शायद सुन लेंगे मेरी कुछ बातें...

अब जमाना बदल गया है काफी, कुछ नए टीचर्स भी रखने होंगे
वरना कुछ लोग शिकायत करेंगे और सपनों के स्कूल आने से डरेंगे
बस कोई ये ना सोचे कि आकर सपनों के स्कूल,
कर दी उसने कोई बड़ी सी भूल...

मैं तो चलना सीख गया हूँ ज़माने संग
बस फिकर है मुझे उन मासूम नए चेहरों की,
कहीं बदल ना जाये उनके सपनों के रंग... 


Tuesday, 6 September 2011

यादों की बोतल...

आज सोचता हूँ यादों की बोतल संग माहौल बनाया जाये.
भरी पढ़ी हैं हर कोनों में कहीं ना कहीं.
वो नयी वाली कुछ पड़ी हैं टेबल के ऊपर, कुछ सामने सजी हैं उस शीशे के अन्दर,
कुछ अलमारी में, तो कुछ कड़वी वाली उस बक्से में जिसकी चाबी खो गयी है.
वो शीशे वाली आजमाई जाए, कुछ ज्यादा ही मज़ा देती हैं...

कविता का प्याला, पुरानी तस्वीरों  का पानी और music का snacks.
सूट्टा तो मैं खुद से आज भी नहीं जलाता, यारों संग ही धुवां बांटने की आदत है...

पहला पेग कुछ ज्यादा ही hard बन गया
और मैं भी सीधे ढाबे पर पहुँच गया
दो पराठे और चाय का आर्डर दे देता हूँ
सबने अपने आर्डर दे दिए हैं, मैगी, मोमो, fried rice, थुप्पा, सूप...
कुछ  केवल चाय  संग धुवां लेंगे बस
आर्डर आने में टाइम है अभी, मैं भी अपना दूसरा पेग ले लूँ ...

दुसरे पेग के बाद याद आया 200 rs उधार लिए थे दोस्त से
सोचता हूँ आज पार्टी हो जाए,
अब सबके सामने लिए थे तो दे भी दूँ.
अब तक आर्डर भी आ गए हैं सबके और शुरू हो गया है वो प्यार बांटने का सिलसिला...

चाय भी आने ही वाली है तब तक मैं एक और पेग ले लूँ
आज तो 200 rs कमाए हैं अपने यार ने बिल तो उसे ही है भरना...

मैं भी अपना प्याला भर दूँ नए पेग से
अब थोडा धुवां बाँट लूँ...
अड्डे पे चलने का टाइम हो गया है शायद,
सबकी bikes ready हैं...

मैं भी सोचता हूँ आज के लिए 4 पेग ही काफी हैं.
कल ऑफिस भी जाना है...
ज्यादा पियूँगा तो यादों का hangover काम नहीं करने देगा...


Sunday, 4 September 2011

हंसी के सिक्के...

मैं बाज़ार के सिलसिले में,
कभी-कभी गुजरता था उस रास्ते से
तो एक मासूम मिलता था मुझे एक मोड़ पे
बगल में एक और मासूमियत संग बैठा
वो पूछता था सबसे कुछ सिक्कों के लिए...

मैंने भी एक दिन सिक्का देने के बहाने पूछ लिया उसका हाल-चाल,
और बदले में उसने दे दिए कुछ हँसी के सिक्के

मालूम नहीं कितना लम्बा चला था ये सिलसिला...
एक दिन की याद है मुझको, जब सिक्के नहीं थे मेरे पास देने को,
मैं उससे नजर बचाके कदम बढाने लगा
इतने में आवाज़ देके उसने बुला दिया अपने पास,
सिक्के नहीं मांगे थे उस दिन बस हाल-चाल ही पूछा था
और बदले में मुझे दे दिए वो हँसी के सिक्के फिर से
अगले दिन भी मैं बाज़ार गया हँसी के सिक्कों को खरीदने,
पर वो हँसी के सिक्कों वाला दिखा नहीं मुझे
आस-पास वालों से पूछा, ये आज आया था क्या ?
भला कोई क्यूँ उसकी खबर रखता...
उस दिन खाली हाथ ही लौटा था मैं 
वो हँसी के सिक्के और कहीं मिले नहीं बाज़ार में,
और मैंने ज्यादा खोजा भी नहीं...

शाम को अखबार टटोला तो पता चला,
ये सिक्के लेने वाले चुभते हैं कुछ लोगों की आँखों में
और शहर में एक नया कायदा-सा आया है,
अब यूँ ही कोई हँसी के सिक्के कहीं पे भी नहीं बेचेगा...

इसके बाद भी जब भी मैं बाज़ार को जाता,
पूछता जरूर था उन मोहल्ले वालों से,
वो मेरे जाने के बाद आया तो नहीं था
वो आया था क्या ?
उन्होंने भी मेरे इस फितूर को हँसी में उड़ा दिया
कुछ ने पूछा क्या आपका कुछ सामान ले गया था चुरा के?
पर मैं उनको कभी कुछ बता ना पाया
जिन चेहरों पे हँसी सिक्कों से आती हो,
वो हँसी के सिक्के क्या जाने...

अब बाज़ार भी कुछ बड़ा-सा है, बदल गया है
पर वो हँसी के सिक्कों वाला कोई दिखता नहीं इस बड़े से बाज़ार में...


*इस कविता की प्रेरणा गुलजार साब की कविता 'मैं रोजगार के सिलसिले में' से मिली