Sunday, 23 October 2011

तुम्हारी आँखों का काजल...

तुम्हारी आँखों का काजल चश्मों के अंदर से झांकता होगा
मेरी राह ताकता होगा

शायद उसे भी पता है
ये शीशे के उस पार काजल वाली आँखें मुझे हैं भाती
ये आँखें ही तो हैं जो चश्मे और काजल को रोजगार हैं दिलाती
काजल सुकून देता होगा और चश्मा बचाता होगा धूल से

मत उतारा करो चश्मे और काजल को
बेचारे भूखे पेट मर ही जायेंगे
वैसे भी इन बेशकीमती आँखों को सख्त जरूरत है पहरेदारी की... 


Saturday, 22 October 2011

पतंगें आज भी उडाता हूँ...

बचपन में पतंगों संग फिकरें भी उड़ जाती थी आसमां में
बस एक फिकर कटने की

पतंगें आज भी उड़ाता हूँ सपनो की
और एक पल को फिकरें भी उड़ जाती है सब
खुद ही कन्नी बनाता हूँ और चरखी भी सम्हालता हूँ
बड़ी मेहनत से मांजा बनाया है
कभी ढील देता हूँ तो कभी खींच
आज भी मैदान पर ही हूँ
मुकाबला है ऊँची छत वालों से
हवा भी कुछ ख़ास चलती नहीं
ना जाने क्यूँ कटने की फिकर भी कुछ ज्यादा ही
लूटने वालों की कमी नहीं
और कोई साथी भी संग नहीं
जो दौड़ के उठा ले मेरी कटी पतंग
हर पल कटती है एक पतंग
और चारों ओर है बस एक ही शोर
लूटो लूटो...



Tuesday, 18 October 2011

बस्ता जिम्मेदारी का ...


बचपन में एक बस्ता लेकर चलता था मैं अपने संग 
छोटा मगर कुछ भारी सा,
बस्ता मेरी जिम्मेदारी का
धीरे-धीरे बस्ता हल्का होता गया
मगर जिम्मेदारियों का बोझ फिर भी कम ना हुआ
फिर एक समय ऐसा भी आया बस्ता जाने कहाँ गुम गया
शायद काबिल नहीं था वो भी नयी जिम्मेदारियों के...

अब एक नया बस्ता मिला है लैपटॉप संग
जिसमे सारी जिम्मेदारियां सिमट जाती हैं और हाँ ज़िन्दगी भी...


Tuesday, 11 October 2011

एक कहानी ख्वाबों की...

ये खवाबों की स्वेटर बुनता और पहनने को उसे दे देता.
सर्दियां पूरे साल ही रहती थी उन पहाड़ों पर.
दोनों की सर्दियां अच्छे से कट रही थी,
ये अपने ख्वाब और उसके साथ में खुश था
और वो इसकी दी हुई स्वेटर में ...

इसने भी कुछ ज्यादा ही बड़े ख्वाब  बुनना शुरू कर दिया.

बुनता भी क्यूँ नहीं इतने साल आज तक सर्दियों में गुजारे थे...
अब ख्वाब बड़े थे, महंगे थे...
महंगे ख्वाबों को बुनने में कुछ वक़्त ज्यादा ही लगता है...
इसे भी भरोसा था अपने आप पर...
बस एक छोटी सी गलती कर बैठा,
बाँट दिए ख्वाब उसके संग ...


वो ख्वाब कोई बिकावु नहीं थे.
ये इसके अपने ही थे और अपना समझ कर ही उसके संग बांटे थे...
इसने तो बेचे नहीं थे,
लेकिन उसने बिकावु समझ के युही मुफ्त में खरीद लिए...

ख्वाब तो इसने देखे थे पर स्वाद उसको कुछ ज्यादा ही लग गया ख्वाबों का...
वो शायद नादान, कमसिन ही रही उम्र के साथ साथ...
एक दिन गाँव में कोई सहरी व्यापारी आया जो सच में कुछ बड़े-बड़े ख्वाब बेचता था...
और अच्छी बात ये थी उन ख़्वाबों को खरीदने के लिए वक़्त नहीं कुछ पैसे लगते थे...
जो उस व्यापारी के पास कुछ ज्यादा ही थे.
वो चल दी उस अजनबी व्यापारी संग...
इसे थोड़ी सी मायूसी हुई थी.

आज सुना है इसके ख्वाब हकीकत बन गए हैं.
और कुछ कम वक़्त में ही इसने ख़रीदा है इनको...
लेकिन कहीं ना कहीं इसे लगता है, वो ख्वाब आज भी ख्वाब ही है.
क्यूंकि इन ख़्वाबों की तस्वीर में दिखने वाला वो चेहरा तो आज गायब ही है, कहीं खो गया है...
ख्वाब शायद फिर से ख्वाब बनकर ही रह गया ...

Tuesday, 4 October 2011

today morning when heading for office a long queue was there on the service road...I thought some exam or sumthing...1 bouncer kind f person came to me...haan bhai line peeche hai...I asked kaun si line ?... bhai bada Amitabh Bachhan hora tu kon si line matlab...audition ki line...It was MTV Roadies audition...a big very big queue was there...more than 1 km I guess...and just besides there was a sm...all banner written “We welcomes Indian Army” in front of gate of an engineering college (Indian Army for campus recruitment )...I don’t know about the queue...but while coming back from office some college students were discussing yaar koi engineer Army me kyun jayega, wahan hai hi kya... life to Roadies me hai mast...I don’t know from which year they were... they want to go Roadies for adventures and mast life...very far from reality... 
 
was really feeling shame on those guys, who call themselves engineers...

Friday, 30 September 2011

आज दिन आ ही गया अलविदा कहने का...

आज दिन आ ही गया अलविदा कहने का,
कल तक अहसास भी ना था जिसका.
वक़्त थोडा थक ही ले,
तो मैं सबको मिल ही लूँ.
इस वक़्त से ही तो सबकी जंग,
क्यूँ फिर बैठे मेरे संग.
फिर कभी फुरसत मिले तो,
दिखलायेगा फिर वो रंग.
हर एक पल में सदियाँ जीलो,
शायद यही जीने का ढंग.
…………………




आज तो आसमां भी नम है, चाँद भी थोडा-थोडा कम है.
ये चाँद का जो ढंग है, वही  जिंदगी का रंग है.
आज थोडा-थोडा कम है, तो कल फिर पूरा संग है.
…………………
बंद आँखों में देखे सपने, सब बेगाने फिर भी अपने.
खुली आँख तो हुआ यकीन, ये सपने सच होते हैं कहीं.
यूँ पहले भी हुआ था सबसे दूर, शायद यही दुनिया का दस्तूर.
फिर मिलूं किसी से युहीं यहाँ, था कहाँ मुझे मंजूर.
पर युहीं तन्हा चलकर जाता कितना दूर.
फिर से कहीं जब नजर में आई, बीते दिनों की वो कुछ छाया.
ना चाहकर भी उस पल को, मैं खुद को रोक ना पाया.
बैठा फिर कुछ देर वहां पर, जाने क्यूँ  फिर से ख्याल ये आया.
अभी सफ़र तो काफी बाकी, कहाँ अभी मैं मंजिल पाया.
ये तो हैं कुछ देर के साथी, सबकी अलग है मंजिल.
मुझे तो है  जिस मंजिल जाना, उसकी राहें बड़ी हैं मुश्किल.
……………………
फिर से सबको है अलविदा,
हो रहा हूँ मैं सबसे जुदा.
मंजिल है मेरी दूर अभी,
फुरसत से फिर मिलेंगे कभी.
वो कभी कहाँ कब आएगा,
ये तो वक़्त मुझे बतलायेगा.
बस वक़्त ही जानने पायेगा.
…………….........
अब पल आ ही गया अलविदा कहने का...

will miss u Bangalore...

Thursday, 29 September 2011

जाने कबसे वो टी-शर्ट लटकी है...

एक बात है जो दिल में ना जाने कबसे है अटकी
बात कहूँ या जज्बात कहूँ
लगता है जैसे कोई टी-शर्ट जाने कबसे खूंटी से है लटकी
नयी है...
बस बाहर से धूल जम गयी है
अब कुछ गन्दी और पुरानी-सी लगती है...
ऐसा ही कुछ वो रिश्ता भी है शायद
सब कुछ सही है
बस कुछ धूल जम गयी है फासलों की
फासले जो केवल दिखते हैं कुछ नक्शों में
कुछ हैं जो ख़ामोशी ने बनाये वो दिखते नहीं
अब कुछ दिखती हैं तो बस ग़लतफ़हमी की ऊँची दीवारें...
इन्ही ऊँची दीवारों पर गढ़ी एक खूंटी से,
जाने कबसे वो टी-शर्ट लटकी है...