Saturday, 1 August 2015

पहाड़ रो रहे हैं...

गाड़ियों का शोर और धुआँ बढ़ता ही जा रहा है
बर्फ कुछ कम दिख रही है पहाड़ों पे

पहाड़ रो रहे हैं...

आओ आँखें पढ़ें...

बातों का काम लोगों का है
आओ आँखें पढ़ें एक-दूसरे की, हम दोनों...

कोकून से क्या निकला...

कोकून से क्या निकला
सारे दर्द भूल गया

मैं अब शब्दों की रेशम बुनता हूँ...

वो टूट के गिरा...

वो टूट के गिरा और बिखर गया
काफी कोशिशों के बाद फिरसे जुड़ पाया है
कुछ अलग सा दिखता है अब
कुछ टुकड़े आज भी खोज रहा है... 

टटोल लेता हूँ डायरी...

टटोल लेता हूँ डायरी कभी-कभी
जब भूल जाता हूँ अपने आप को

मेरी डायरी के पन्ने, मुझे मुझसे बेहतर जानते हैं...

सैकड़ों जिंदगी जिया मैं...

सैकड़ों जिंदगी जिया मैं
हज़ारों बार गिरा मैं
गिर के गर मर भी गया
अगले ही पल जिंदगी से मिला मैं...

डायरी की मिट्टी में...

डायरी की मिट्टी में दफनाई थी कुछ यादें
कभी-कभी कुछ बूँद गिरी थी आँखों से मिट्टी में
कुछ अँकुर आये, फिर पौध बनी
आज खिला है पूरा बाग़

पूछा मैंने फूलों से...
दफनाए तो पन्ने थे, कब-कैसे सब ये बीज बने ?