Thursday, 24 November 2011

पुराना मैखाना...


पानी से प्यास ना बुझी तो वो चल दिया मैखाने की ओर.
यूँ तो मैखाना दूर ही था पर फिर भी वो कदम रुके नहीं.
फितूर ही कहूँगा मैं तो, मैखाने में भी भला कोई प्यास बुझती है क्या ?

यहाँ आने वाले तो सारे चेहरे पुराने ही हैं.
कभी-कभार गर कोई नया दिख भी गया,
तो वो भी जल्द ही बन जाता है पुराना.
अब इन मैखानो की बातें नयी सी लगती हैं मुझे...




एक मैखाना तो कभी अपना भी था कुछ छोटा सा.
जिसमे आने वाले चेहरे कभी बदलते नहीं थे,
सब चेहरे हंसी के अलग-अलग रंग थे.
हंसने-हँसाने के किसी बहाने की कमी ना थी उनके पास,
और मैखाना बनाने के बहाने कुछ जयादा ही थे....

अब सुना है वो मैखाना बिक गया है...
कुछ अच्छे दाम मिले हैं उसके मालिक को,
दीवारों पे कुछ नए रंग चड़ाए थे हमारे जाने के बाद.
पहले तो दीवारों का रंग कुछ ख़ास ना था,
हाँ बस रहने वाले सब लोग रंगीन थे.
अब उस मैखाने के सब साथी चले गए हैं अलग-अलग सहर,
कुछ ने नए सहरों में जाने के बाद मैखाने दूंढ लिए हैं.
बताते हैं प्यास तो उनकी भी नहीं बुझती कभी,
सोचा तो मैंने भी था एक-दो बार की जाऊं अकेले ही किसी बार.
पर वो झूठी हंसी वाले चेहरे प्यास और बड़ा देते हैं...
अब जरूरत महसूस नहीं होती किसी बार जाने की,
वो पुराने मैखाने की यादें कुछ ज्यादा ही मज़ा देती हैं
और कुछ देर के लिए प्यास भी बुझ जाती है
सुना था मैंने पुरानी मय की कीमत कुछ ज्यादा ही होती है
कभी खरीदने का मौका तो मिला नहीं,
सच ही होगा शायद ...
चलो कोई नहीं...
कुछ पुराने मैखाने की यादें कमाई हैं मैंने,
इनकी कीमत के बारे में तो कभी कुछ सुना नहीं
पर मुझे तो ये बेस्किमती ही लगती हैं...     


Sunday, 13 November 2011

कुछ अजीब ख्यालों का ख़ास बन जाना...

कुछ अजीब से ख्याल आते रहे
जाने क्यूँ...
मैं जान भी ना सका और तुम कुछ ख़ास बन गए
जाने क्यूँ...
अब वो ख्याल अजीब लगते नहीं
कि हर एक ख्याल में अब होती हो तुम्ही... 

आखिर क्या है और क्यूँ है ?
जैसे किसी मौसम की दस्तक संग नए पंछियों का चहचहाना
शाम की सुस्त करवट संग खिड़की के पास बैठ करारी चाय पी जाना
टी वी पर आने वाले हर चेहरे में वो एक शक्ल खोजते जाना
मेसेज बॉक्स में पड़े वो मेसेजेस बन जायें जब हँसने का बहाना
उन बेतुकी बातों में भी अपना दिमाग लगाना
और जाने क्या सोच सोच कर यूँ ही खुद में हँसते जाना
शायद कुछ ऐसा ही होता है
कुछ अजीब ख्यालों का ख़ास बन जाना...


Wednesday, 26 October 2011

एक दिवाली ऐसी भी...


आज फिर कुछ जल्दी से आँखें खुली
और सुबह को नए दिन के लिए सजते हुए देखा
बर्फ से ढकी चट्टानों को देख यूँ लगा,
मानो कोई परी अपने सूरज के इन्तेजार में है
एक ठंडी और साफ़ हवा,
बिना खुशबू के भी एक ताजा सी महक दे रही थी...



पढ़ा था मैंने किताबों में,
कभी कहा था किसी शहन्शाह ने,
स्वर्ग धरती पे यहीं कश्मीर में है
सच ही कहा था अब जान पाया हूँ
यूँ तो अपना घर सभी के लिए स्वर्ग सा होता है,
जिसे छोड़ने का अफ़सोस हुआ था थोड़ा सा
मगर घर से दूर भी स्वर्ग में ही रहने आया हूँ...


आज घरों में दिवाली है
दिये,मिठाई,प्यार और आतिशबाजी का त्यौहार
आतिशबाज़ी से याद आया,
बचपन में थोड़ा सा डरता भी था मैं इनसे कभी-कभी
पर अब तो आतिशबाज़ी की आदत सी हो गयी है
वरना ज़िन्दगी सूनी-सूनी सी लगने लगती है
दिवाली के लिए किसी अमावस का इन्तेजार नहीं है अब
दिये की तरह जलता हूँ दिन-रात कि देश मेरा रोशन रहे
और कहने को रोज ही दिवाली खेल लेता हूँ कि घरों में दिवाली होती रहे...

अब तो आदत सी हो गयी है स्वर्ग में रहने की शायद
और एक अच्छी बात भी सुनी है मैंने,
"मरने के बाद शहीदों को स्वर्ग ही मिलता है"
तभी तो आतिशबाज़ी से रोज ही खेल लेता हूँ
और अब मरने से कहाँ मैं डरता हूँ
वो घर मेरा स्वर्ग बना रहे इसलिए इस स्वर्ग में रहता हूँ...

Sunday, 23 October 2011

तुम्हारी आँखों का काजल...

तुम्हारी आँखों का काजल चश्मों के अंदर से झांकता होगा
मेरी राह ताकता होगा

शायद उसे भी पता है
ये शीशे के उस पार काजल वाली आँखें मुझे हैं भाती
ये आँखें ही तो हैं जो चश्मे और काजल को रोजगार हैं दिलाती
काजल सुकून देता होगा और चश्मा बचाता होगा धूल से

मत उतारा करो चश्मे और काजल को
बेचारे भूखे पेट मर ही जायेंगे
वैसे भी इन बेशकीमती आँखों को सख्त जरूरत है पहरेदारी की... 


Saturday, 22 October 2011

पतंगें आज भी उडाता हूँ...

बचपन में पतंगों संग फिकरें भी उड़ जाती थी आसमां में
बस एक फिकर कटने की

पतंगें आज भी उड़ाता हूँ सपनो की
और एक पल को फिकरें भी उड़ जाती है सब
खुद ही कन्नी बनाता हूँ और चरखी भी सम्हालता हूँ
बड़ी मेहनत से मांजा बनाया है
कभी ढील देता हूँ तो कभी खींच
आज भी मैदान पर ही हूँ
मुकाबला है ऊँची छत वालों से
हवा भी कुछ ख़ास चलती नहीं
ना जाने क्यूँ कटने की फिकर भी कुछ ज्यादा ही
लूटने वालों की कमी नहीं
और कोई साथी भी संग नहीं
जो दौड़ के उठा ले मेरी कटी पतंग
हर पल कटती है एक पतंग
और चारों ओर है बस एक ही शोर
लूटो लूटो...